अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता, क्या वाक़ई शांति सम्भव है

कभी अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन रहे तालिबान के साथ अब अमेरिका ने एक शांति समझौते के लिए हाथ मिला लिए हैं. अमेरिका और उसके सहयोगी अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाने पर राज़ी हो गए हैं. अमरीका और तालिबान ने इस मद्देनज़र ‘एक विस्तृत शांति समझौते’ पर हस्ताक्षर किए. यह समझौता क़तर की राजधानी दोहा में किया गया. अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और तालिबान के नेताओं द्वारा इस समझौते पर दस्तख़त किए गए.

करीब 18 महीने की वार्ता के बाद दोनों पक्षों ने इस शांति समझौता पर हस्ताक्षर किए हैं. लगभग 30 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विदेश मंत्री और प्रतिनिधि अमेरिका-तालिबान शांति समझौते पर हस्ताक्षर के गवाह बने. इस मौक़े पर भारत के प्रतिनिधि भी मौजूद थे.

इस समझौते से 18 साल से अफ़ग़ानिस्तान में चल रहा संघर्ष ख़त्म होने की उम्मीद जताई जा रही है. समझौते के मुताबिक़ अमेरिका 14 महीने के अंदर अफगानिस्तान से अपने सैन्य बलों को निकाल लेगा. लेकिन अमेरिका अफगानिस्तान के के सैन्य बलों को सैन्य साजो-सामान देने के साथ प्रशिक्षित करता रहेगा.

तालिबान ने इस समझौते के तहत बदले में अमेरिका को भरोसा दिलाया है कि वह अल-कायदा और दूसरे विदेशी आतंकवादी समूहों से अपना नाता तोड़ लेगा. साथ ही अफगानिस्तान की धरती को आतंकवादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देने में अमेरिका की मदद करेगा.

क्या वाक़ई यह एक शांति समझौता है ?

क्या यह समझौता वास्तव में शांति स्थापित कर पाएगा इसको लेकर विशेषज्ञों में आशंका है. अमेरिकी सैनिक पिछले 18 सालों से अफगानिस्तान में हैं. उनकी लड़ाई तालिबान और अल क़ायदा से थी. लेकिन अमेरिका इन संगठनों को ख़त्म कर पाने में नाकाम रहा है. अमेरिका में यह एक बड़ा मुद्दा रहा है. इस युद्ध में अमेरिका ने कई अरब डालर और कई सैनिकों का नुक़सान उठाया है. अमेरिकी जनता इस युद्ध को ख़त्म करने और सैनिकों को वापस लाने का दबाव बना रही है.

अमेरिका में 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में यह बड़ा मुद्दा है. पिछले चुनाव में अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी फौज की वापसी को बड़े मुद्दे को ट्रम्प ने ज़ोर शोर से उठाया था और ट्रम्प को उसका फ़ायदा भी मिला लेकिन ट्रम्प यह वादा आज से पहले तक पूरा नहीं कर पाए हैं. अब ताजा समझौते के बाद अमेरिकी सैनिकों की वापसी ट्रंप को इस मुद्दे पर राष्ट्रपति पद के चुनाव में फायदा हो सकता है.

कौन ख़ुश नहीं है इस समझौते से

सबसे पहले तो अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार ही इस समझौते से ख़ुश नहीं है. तालिबान अफगान सरकार को नहीं मानता. अफ़ग़ान सरकार का कहना था कि एक आतंकी समूह से बात करने का कोई मतलब नहीं है.

कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अमेरिकी सैनिकों के वापस जाते ही तालिबान अफ़ग़ान सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर सकता है और अफगानिस्तान एक नये गृह युद्ध की तरफ़ बढ़ सकता है.

भारत के लिए भी यह अच्छी खबर नहीं है. भारत शुरुआत से ही तालिबान का खुले तौर पर विरोध करता रहा है. भारत में हुए आतंकी हमलों में तालिबान समर्थित गुटों का हाथ रहा है. तालिबान के वापस आते ही इस तरह की घटनाओं में वृद्धि होने का डर है.

किसके लिए है अच्छी खबर

तालिबान के लिये यह समझौता यह एक राहत की साँस है. अब तालिबान आराम से अपना एजेण्डा लागू कर सकता है. दूसरी ख़ुशी होगी पाकिस्तान को. इस समझौते के लिए पाकिस्तानी सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई बिचौलिए का काम कर रही थी. अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों के वापस जाते ही पाकिस्तान तालिबान की मदद से कश्मीर में अपने मंसूबो को अंजाम दे सकता है