क्या है सीरिया संकट

सीरिया में पिछले आठ साल से चल रहा गृह युद्ध शांत होने नाम नहीं ले रहा है. इस युद्ध में लाखों लोग या तो मारे जा चुके हैं या फिर विस्थापित हो गए हैं. इसकी वजह से दुनिया भर में शरणार्थी संकट पैदा हो गया है:

संकट की शुरुआत हुई एक विरोध प्रदर्शन से हुई. मार्च 2011 में सीरिया की जनता ने राष्ट्रपति बशर अल असद के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने शुरू किए. बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. असद परिवार सालों से सीरिया की सत्ता सम्हाले हुए था.

मार्च 2011 में सीरिया की जनता बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और राजनैतिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरी थी. वास्तव में सीरिया की जनता अरब जगत में आए तत्कालीन राजनैतिक बदलावों से प्रेरित थी जिन्हें अरब क्रांति के नाम से जाना जाता है. इस समय अरब में गद्दाफ़ी जैसे तानाशाहों का अंत हुआ था और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की बात हो रही थी. इसी के चलते सीरिया में भी लोग अपनी सरकार के ख़िलाफ़ हो गए.

असद को सीरिया में यह विरोध प्रदर्शन अपने लिए एक ख़तरे की घंटी लगी और उन्होंने इन्हें पूरी ताक़त के साथ कुचलने का प्रयास किया. उन्होंने आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर सुरक्षाबलों का प्रयोग किया. सुरक्षाबलों ने आंदोलनकारियों पर बहुत क्रूरता दिखाई जिसके फलस्वरूप लोग और उग्र हो गए. असद के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और लोगों ने असद से इस्तीफे की मांग शुरू कर दी.

आगे चलकर असद के विरोधियों ने हथियार उठा लिए और सरकार के ख़िलाफ़ सशस्त्र संघर्ष शुरू कर दिया. हालाँकि विरोधियों ने पहले यह हथियार सुरक्षाबलों से अपनी रक्षा के लिए उठाये थे लेकिन शीघ्र ही उन्होंने सुरक्षाबलों को अपने इलाक़ों से खदेड़ना शुरू कर दिया. असद ने इसे आतंकवादी कार्यवाही बताया और विरोधियों के ख़िलाफ़ और सख़्ती दिखानी शुरू कर दी. इसकी वजह से एक साल के भीतर ही सीरिया में असद के सुरक्षाबलों और विरोधियों में गृहयुद्ध की स्थिति हो गई . विरोधियों ने असद सरकार को मानने से इनकार कर दिया और अपनी नई व्यवस्था चलाने का एलान कर दिया.

यह लड़ाई शिया और सुन्नी के बीच भी शुरू हो गई क्योंकि असद शिया समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं जबकि सीरिया में सुन्नी बहुसंख्यक हैं. असद ने विदेशी ताक़तों पर इस लड़ाई को साम्प्रदायिक रंग देने का आरोप लगाया.

अमेरिका शुरू से ही असद का विरोधी रहा है. इस लड़ाई में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने असद का विरोध किया जबकि रूस और ईरान खुल कर असद के साथ आ गए.

इस्लामिक स्टेट संगठन

इसी दौरान सीरिया के उत्तर और पूर्वी इलाक़ों में इस्लामिक स्टेट या आइ एस का क़ब्ज़ा हो गया. यह संगठन इराक़ और सीरिया से सटी सीमाओं पर अपना क़ब्ज़ा कर रहा था जिसका उद्देश्य एक इराक़ और सीरिया को मिलाकर वृहत इस्लामिक राज्य स्थापित करना और पश्चिमी ताक़तों को मध्य एशिया से उखाड़ फेंकना था. आइ एस एक सुन्नी संगठन था.आइ एस से प्रभावित होकर दुनिया भर से युवा इराक़ और सीरिया जाने लगे. ये लोग आइ एस की तरफ़ से लड़ना चाहते थे. वहीं ईरान, अफगानिस्तान और लेबनान जैसे देशों से शिया लोग सीरिया के समर्थन में लड़ने जाने लगे.

क़ुर्दों की भूमिका

उत्तरी सीरिया में कुर्द समुदाय रहता है यहाँ आइ एस ने क़ुर्दों से युद्ध शुरू किया. सीरिया की सेना ने आइ एस के ख़िलाफ़ भी जंग छेड़ी. वहीं कुर्द और सीरिया की सेना भी आपस में उलझने लगी चूँकि असद उत्तरी सीरिया पर क़ुर्दों के नियंत्रण से खुश नहीं थे. अमेरिका ने भी आइ एस पर हवाई हमले शुरू किए.

अब तक .सीरिया में स्थिति अजीबोग़रीब हो गई. एक और जहां सीरिया की सेना , कुर्द और आइ एस लड़ रहे थे वहीं देश के कई हिस्सों में सीरिया की सेना और विद्रोही गुट लड़ रहे थे. विद्रोही गुटों तो अमेरिका मदद कर रहा था तो सीरिया की सेना को रूस.

इसी बीच एक नया समीकरण बना. अमरीका और कुर्द. अमेरिका क़ुर्दो की मदद कर रहा था. अमेरिका क़ुर्दो माध्यम से आइ एस पर निशाना साध रहा था. दूसरी तरफ़ तुर्की कुर्द बलों को आतंकवादी मानता था और तुर्की ने क़ुर्दो पर हमले शुरू कर दिए. तुर्की लंबे समय से चाहता था कि अमरीका कुर्दों के साथ सहयोग बंद करे.

तुर्की के दक्षिण-पूर्व, सीरिया के उत्तर-पूर्व, इराक़ के उत्तर-पश्चिम और ईरान के उत्तर पश्चिम में ऐसा हिस्सा है, जहां कुर्द बसते हैं.कुर्द हैं तो सुन्नी मुस्लिम, मगर उनकी भाषा और संस्कृति अलग है. एक समय उस्मानी साम्राज्य के केंद्र रहे तुर्की में 20 फ़ीसदी आबादी कुर्दों की है. कुर्द संगठन आरोप लगाते हैं कि उनकी सांस्कृति पहचान को तुर्की में दबाया जा रहा है. ऐसे में कुछ संगठन 1980 के दशक से ही छापामार संघर्ष कर रहे हैं. तुर्की किसी भी तरह की कुर्द सैन्य शक्ति के ख़िलाफ़ रहा है.

फ़िलहाल सीरिया में स्थिति ज़स की तस बनी हुई है. हालाँकि इस्लामिक स्टेट काफ़ी कमजोर हुआ है और लाख कोशिशों के बाद भी असद सत्ता में बने हुए हैं.