भारत की हालत के लिए कौन ज़िम्मेदार – सरकार या लोग ?

भारत में कोरोना की भयावह स्थिति ने स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासन और सरकार की नाकामी को दुनिया भर के सामने ला दिया है. लगातार बढ़ते मौतों के आँकड़े और बेक़ाबू होती संक्रमण दर के आगे सरकार और डॉक्टर दोनों ही बेबस नज़र आ रहे हैं. ऐसे में एक गहन सवाल उठता है कि आख़िर ये स्थिति आयी कैसे. एक साल पहले जब चीन में इस बीमारी ने अपना प्रकोप दिखाया था तब से कई देशों में हाहाकार मचा हुआ है. तब इसे कोरोना की पहली लहर कहा गया था. भारत में भी सरकार ने लॉकडाउन और कर्फ़्यू जैसे कदम उठाकर स्थिति के नियंत्रण में होने का दावा किया था. लेकिन ऐसा लगता है कि जहां विश्व के अन्य देश इस बीमारी से लड़ने और सम्भावित दूसरी और तीसरी लहर से लड़ने की तैयारी कर रहे थे, वहीं भारत में प्रशासन और सरकारें इस तरह से पेश आ रहीं थी मानो यह बीमारी पूरी तरह समाप्त हो गयी है.

दुनिया भर में पहले से ही यह बात पता थी कि कोरोना का संकट इतनी जल्दी समाप्त नहीं होने वाला है और केवल दो ही चीजें जो कोरोना संकट को कम कर सकती हैं वे थी सोशल डिसटेन्सिंग और वैक्सीन टीकाकरण. भारत में सरकारें इन दोनों को ही समझने में नाकाम रहीं हैं. चार राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और पुद्दुचेरी में कराए गए चुनावों में रजनैतिक दलों रैलियाँ हुई और उनमें जिस कदर लोगों की भीड़ उमड़ी उससे साफ़ ज़ाहिर हो गया कि कोविड की किसी को भी परवाह नहीं है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इन में से कुछ रैलियों का नेतृत्व कर रहे थे. मोदी का भारतीय जनता पर अच्छा प्रभाव है और उन्हें लोग फ़ॉलो करते हैं. प्रधानमंत्री की कोविड के प्रति उदासीनता का सीधा प्रभाव जनता पर बड़ा है. इसके अलावा कुम्भ मेले का आयोजन जिसमें हज़ारों लोग कंधे से कंधा मिला के चल रहे थे, भी सरकार की अनुमति से ही हुआ. हद तो तब हो गयी जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह ने घोषणा की कुम्भ में भाग लेने वालों पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्ष की जाएगी.

Photo by Yogendra Singh on Pexels.com

अब आ रही खबरों के अनुसार कुंभ से लौटकर आए लोगों की कोरोना रिपोर्ट पॉज़िटिव आ रही है और संभवत: देश के कई इलाक़ों में अब कुंभ संक्रमण के फैलने का कारण बन रहा है. कुछ राज्य सरकारों में कुंभ से लौटने वालों के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट कराना अनिवार्य किया लेकिन इस बात का कोई जवाब नहीं कि उन सरकारों के पास इन लोगों की सूची है भी या नहीं.

जब पिछले साल कोरोना का हमला हुआ था तभी पूरे विश्व में यह बात समझ में आ गयी थी कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी है और स्वास्थ्य उपकरण, वेंटीलेटर, दवाएँ और वैक्सीन का प्रबंधन समय रहते करना चाहिए वरना स्थिति भयानक हो सकती है लेकिन लगता है कि सरकार ने इस बात को नाहीं समझा. भारत में अधिकांश मौतें रोगियों को ऑक्सिजन ना मिल पाने की वजह से हुई हैं. ये रोगी कोरोना से लड़ सकते थे अगर उन्हें समय से ऑक्सिजन मिल जाती तो. लेकिन हमने लोगों को ऑक्सिजन की कमी से सड़कों और अस्पतालों के बाहर मरते हुए देखा. राज्य सरकारें एक दूसरे को ऑक्सिजन की सप्लाई के लिए दोष देती रही, केंद्र सरकार को लम्बे समय तक समझ ही नहीं आया कि करें क्या.

भारत में इस समय सबसे मज़बूत कोई व्यक्ति है तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सबसे मज़बूत कोई संगठन है तो वो है मोदी की पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP). BJP की केंद्र और 12 राज्यों में सरकार है लेकिन लगता नहीं कि BJP ने भी कोरोना को गम्भीरता से लिया.

वैज्ञानिक और चिकित्सकों की सलाहों की लगातार अनदेखी भी सरकारों के लिए एक आम बात हो गयी है. भारतीय चिकित्सा संघ, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने एक बयान में कोरोना वायरस की स्थिति से निपटने के लिए सही कदम ना उठाने को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की है और राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का समर्थन किया है. उन्होंने अपने बयान में कहा कहा, “आईएमए कोविड-19 महामारी की विनाशकारी दूसरी लहर से पैदा हुए संकट से निपटने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बेहद सुस्त और अनुपयुक्त तरीक़ों को देखकर हैरान है. सामूहिक चेतना, आईएमए व अन्य पेशेवर सहयोगियों द्वारा किए गए अनुरोधों को कूड़ेदान में डाल दिया जाता है, और अक्सर ज़मीनी हकीकत को समझे बिना निर्णय लिए जाते हैं.”

इससे पहले भी फ़रवरी में आईएमए ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन से बाबा रामदेव की कंपनी द्वारा तैयार की गई कोरोना की ‘तथाकथित दवा’ कोरोनिल को लॉन्च करने पर स्पष्टीकरण माँगा था. उन्होंने ये सवाल भी उठाया कि अगर कोरोनिल, कोरोना से बचाव में इतनी प्रभावशाली है तो भारत सरकार टीकाकरण पर 35 हज़ार करोड़ रुपये क्यों खर्च कर रही है. रामदेव ने दावा किया था कि पतंजलि रिसर्च इंस्टिट्यूट की कोरोना दवा कोरोनिल विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन से सर्टिफाइड है. रामदेव का दावा था कि डब्ल्यूएचओ ने कोरोनिल को गुड मैनुफैक्‍चरिंग प्रैक्टिस का सर्टिफिकट दिया है. लेकिन इसके बाद वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने पतंजलि के इस दावे के बाद बड़ा बयान दिया. इसमें कहा गया कि डब्ल्यूएचओ की तरफ से कोरोना के इलाज के लिए अब तक किसी भी पारंपरिक औषधि को मंजूरी नहीं दी गई है.

अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा है कि भारत में जनता और सरकार दोनों ने कोरोना को लेकर बेहद लापरवाही दिखाई जिसका नतीजा दूसरी लहर के रूप में सामने आया है. लोगों ने कोरोना के खिलाफ सुरक्षात्मक उपायों को गंभीरता से नहीं लिया. उन्होंने कहा कि भारत में कई लोगों को ऐसा लगा कि संकट खत्म हो गया. लोगों ने मास्क लगाना और अन्य उपायों का पालन करना छोड़ दिया.        

फ़िलहाल स्थिति भयावह है और सारी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि सरकारें मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर त्वरित कदम उठाएँगी.

भारत की हालत के लिए कौन ज़िम्मेदार – सरकार या लोग ?

भारत में कोरोना की भयावह स्थिति ने स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासन और सरकार की नाकामी को दुनिया भर के सामने ला दिया है. लगातार बढ़ते मौतों के आँकड़े और बेक़ाबू होती संक्रमण दर के आगे सरकार और डॉक्टर दोनों ही बेबस नज़र आ रहे हैं. ऐसे में एक गहन सवाल उठता है कि आख़िर ये स्थिति आयी कैसे. एक साल पहले जब चीन में इस बीमारी ने अपना प्रकोप दिखाया था तब से कई देशों में हाहाकार मचा हुआ है. तब इसे कोरोना की पहली लहर कहा गया था. भारत में भी सरकार ने लॉकडाउन और कर्फ़्यू जैसे कदम उठाकर स्थिति के नियंत्रण में होने का दावा किया था. लेकिन ऐसा लगता है कि जहां विश्व के अन्य देश इस बीमारी से लड़ने और सम्भावित दूसरी और तीसरी लहर से लड़ने की तैयारी कर रहे थे, वहीं भारत में प्रशासन और सरकारें इस तरह से पेश आ रहीं थी मानो यह बीमारी पूरी तरह समाप्त हो गयी है.

दुनिया भर में पहले से ही यह बात पता थी कि कोरोना का संकट इतनी जल्दी समाप्त नहीं होने वाला है और केवल दो ही चीजें जो कोरोना संकट को कम कर सकती हैं वे थी सोशल डिसटेन्सिंग और वैक्सीन टीकाकरण. भारत में सरकारें इन दोनों को ही समझने में नाकाम रहीं हैं. चार राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और पुद्दुचेरी में कराए गए चुनावों में रजनैतिक दलों रैलियाँ हुई और उनमें जिस कदर लोगों की भीड़ उमड़ी उससे साफ़ ज़ाहिर हो गया कि कोविड की किसी को भी परवाह नहीं है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इन में से कुछ रैलियों का नेतृत्व कर रहे थे. मोदी का भारतीय जनता पर अच्छा प्रभाव है और उन्हें लोग फ़ॉलो करते हैं. प्रधानमंत्री की कोविड के प्रति उदासीनता का सीधा प्रभाव जनता पर बड़ा है. इसके अलावा कुम्भ मेले का आयोजन जिसमें हज़ारों लोग कंधे से कंधा मिला के चल रहे थे, भी सरकार की अनुमति से ही हुआ. हद तो तब हो गयी जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह ने घोषणा की कुम्भ में भाग लेने वालों पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्ष की जाएगी.

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अब आ रही खबरों के अनुसार कुंभ से लौटकर आए लोगों की कोरोना रिपोर्ट पॉज़िटिव आ रही है और संभवत: देश के कई इलाक़ों में अब कुंभ संक्रमण के फैलने का कारण बन रहा है. कुछ राज्य सरकारों में कुंभ से लौटने वालों के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट कराना अनिवार्य किया लेकिन इस बात का कोई जवाब नहीं कि उन सरकारों के पास इन लोगों की सूची है भी या नहीं.

जब पिछले साल कोरोना का हमला हुआ था तभी पूरे विश्व में यह बात समझ में आ गयी थी कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी है और स्वास्थ्य उपकरण, वेंटीलेटर, दवाएँ और वैक्सीन का प्रबंधन समय रहते करना चाहिए वरना स्थिति भयानक हो सकती है लेकिन लगता है कि सरकार ने इस बात को नाहीं समझा. भारत में अधिकांश मौतें रोगियों को ऑक्सिजन ना मिल पाने की वजह से हुई हैं. ये रोगी कोरोना से लड़ सकते थे अगर उन्हें समय से ऑक्सिजन मिल जाती तो. लेकिन हमने लोगों को ऑक्सिजन की कमी से सड़कों और अस्पतालों के बाहर मरते हुए देखा. राज्य सरकारें एक दूसरे को ऑक्सिजन की सप्लाई के लिए दोष देती रही, केंद्र सरकार को लम्बे समय तक समझ ही नहीं आया कि करें क्या.

भारत में इस समय सबसे मज़बूत कोई व्यक्ति है तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सबसे मज़बूत कोई संगठन है तो वो है मोदी की पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP). BJP की केंद्र और 12 राज्यों में सरकार है लेकिन लगता नहीं कि BJP ने भी कोरोना को गम्भीरता से लिया.

वैज्ञानिक और चिकित्सकों की सलाहों की लगातार अनदेखी भी सरकारों के लिए एक आम बात हो गयी है. भारतीय चिकित्सा संघ, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने एक बयान में कोरोना वायरस की स्थिति से निपटने के लिए सही कदम ना उठाने को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की है और राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का समर्थन किया है. उन्होंने अपने बयान में कहा कहा, “आईएमए कोविड-19 महामारी की विनाशकारी दूसरी लहर से पैदा हुए संकट से निपटने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बेहद सुस्त और अनुपयुक्त तरीक़ों को देखकर हैरान है. सामूहिक चेतना, आईएमए व अन्य पेशेवर सहयोगियों द्वारा किए गए अनुरोधों को कूड़ेदान में डाल दिया जाता है, और अक्सर ज़मीनी हकीकत को समझे बिना निर्णय लिए जाते हैं.”

इससे पहले भी फ़रवरी में आईएमए ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन से बाबा रामदेव की कंपनी द्वारा तैयार की गई कोरोना की ‘तथाकथित दवा’ कोरोनिल को लॉन्च करने पर स्पष्टीकरण माँगा था. उन्होंने ये सवाल भी उठाया कि अगर कोरोनिल, कोरोना से बचाव में इतनी प्रभावशाली है तो भारत सरकार टीकाकरण पर 35 हज़ार करोड़ रुपये क्यों खर्च कर रही है. रामदेव ने दावा किया था कि पतंजलि रिसर्च इंस्टिट्यूट की कोरोना दवा कोरोनिल विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन से सर्टिफाइड है. रामदेव का दावा था कि डब्ल्यूएचओ ने कोरोनिल को गुड मैनुफैक्‍चरिंग प्रैक्टिस का सर्टिफिकट दिया है. लेकिन इसके बाद वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने पतंजलि के इस दावे के बाद बड़ा बयान दिया. इसमें कहा गया कि डब्ल्यूएचओ की तरफ से कोरोना के इलाज के लिए अब तक किसी भी पारंपरिक औषधि को मंजूरी नहीं दी गई है.

अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा है कि भारत में जनता और सरकार दोनों ने कोरोना को लेकर बेहद लापरवाही दिखाई जिसका नतीजा दूसरी लहर के रूप में सामने आया है. लोगों ने कोरोना के खिलाफ सुरक्षात्मक उपायों को गंभीरता से नहीं लिया. उन्होंने कहा कि भारत में कई लोगों को ऐसा लगा कि संकट खत्म हो गया. लोगों ने मास्क लगाना और अन्य उपायों का पालन करना छोड़ दिया.        

फ़िलहाल स्थिति भयावह है और सारी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि सरकारें मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर त्वरित कदम उठाएँगी.